जब शासन ने पहले ही कर दिए तबादले, फिर जिला पूर्ति अधिकारी ने 11 जून को ट्रांसफर आदेश क्यों जारी किए? शासन को सीधी चुनौती या समन्वयहीनता की बानगी?
देहरादून, 19 जून 2025 – उत्तराखंड सरकार की स्थानांतरण नीति के तहत जिलाधिकारी देहरादून द्वारा 9 जून को स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि तीन वर्षों से अधिक समय से एक ही तैनाती स्थल पर कार्यरत अधिकारी/कर्मचारी का अनिवार्य रूप से तबादला किया जाए।

उत्तराखंड शासन के खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग ने 10 जून 2025 को तीन क्षेत्रीय खाद्य अधिकारियों और दो पूर्ति निरीक्षकों के स्थानांतरण पहाड़ में करने का आदेश विधिवत रूप से जारी किए और उन्हें एक सप्ताह में नविन तैनाती में ज्वाइन करने का आदर्श दिया।

लेकिन हैरानी की बात यह रही कि ठीक अगले ही दिन यानी 11 जून 2025 को देहरादून के जिला पूर्ति अधिकारी ने भी उन्हीं अधिकारियों के ट्रांसफर आदेश स्थानीय स्तर पर अलग से जारी कर दिए।

अब सवाल यह उठता है कि जब ट्रांसफर का अधिकार और आदेश पहले ही शासन द्वारा निर्गत किए जा चुके थे, तो जिला पूर्ति अधिकारी को एक दिन बाद वही कार्य दोहराने की क्या आवश्यकता पड़ी?
क्या यह विभागीय समन्वय की भारी चूक है या फिर शासन के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की कोशिश?
यह प्रकरण प्रशासनिक प्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है:
क्या जिला पूर्ति अधिकारी को शासन के आदेश की जानकारी नहीं थी?
या जानबूझकर आदेश की अवहेलना करते हुए अपनी मर्जी से ट्रांसफर आदेश जारी किए गए?
क्या यह “पावर सिंड्रोम” का मामला है जिसमें जिला स्तरीय अधिकारी खुद को शासन से ऊपर समझने लगे हैं?
इस तरह की दोहरी कार्रवाई से एक ओर जहां अफसरशाही में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, वहीं शासन की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगता है।
अब यह देखना अहम होगा कि क्या शासन इस स्पष्ट असंगति पर कोई स्पष्टीकरण या कार्रवाई करता है, या इसे यूं ही नजरअंदाज कर दिया जाएगा।
