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भारत पर बेमतलब तोहमत

पहले गेहूं निर्यात को लेकर बड़बोले दावे करने के बाद अचानक निर्यात पर रोक लगा देने के निर्णय पर भारत की विदेशों में जो आलोचना हो रही है, वह भी किसी ठोस तर्क पर आधारित नहीं है।

गेहूं निर्यात के मामले में भारत सरकार ने फ्लिप-फ्लॉप दिखाया, वह एक मुद्दा है, जिस पर देश में जरूर चर्चा की जानी चाहिए। वैसे नरेंद्र मोदी सरकार के आठ साल के कामकाज का अनुभव रखने वाले लोगों को ऐसे फैसलों की आदत पड़ चुकी है। ये धारणा ऐसे ही नहीं बनी है कि वर्तमान सरकार फैसला पहले लेती है और उसके संभावित परिणामों पर सोच-विचार बाद में करती है। बहरहाल, पहले गेहूं निर्यात को लेकर बड़बोले दावे करने के बाद अचानक निर्यात पर रोक लगा देने के निर्णय पर भारत की विदेशों में जो आलोचना हो रही है, वह भी किसी ठोस तर्क पर आधारित नहीं है। पश्चिमी मीडिया का स्वर देखें, तो इस मामले में भारत को खलनायक बनाने की कोशिश उसमें दिखती है। दुनिया में गेहूं की महंगाई के लिए अब रूस के साथ-साथ भारत को भी दोषी ठहराया जा रहा है।

गौरतलब है कि भारत के फैसले की आलोचना जी-7 देशों ने सामूहिक रूप से की। जर्मनी के श्टुटगार्ट में हुई जी-7 विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद कहा गया कि अगर हर कोई निर्यात पर पाबंदियां लगाना शुरू कर दे या फिर बाजारों को बंद करना शुरू कर दे तो संकट और गहरा जाएगा। मंगलवार को अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक खाद्य सुरक्षा संबंधी  बैठक में अमेरिकी दूत लिंडा थॉमस ग्रीनफील्ड ने भरोसा जताया कि अमेरिका भारत को ये निर्यात हटाने के लिए तैयार कर लेगा। लेकिन प्रश्न है कि अगर पश्चिमी देशों को दुनिया की खाद्य सुरक्षा की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने सुरक्षित भंडार से अनाज का निर्यात क्यों नहीं शुरू कर देते? या फिर यूक्रेन को लगातार हथियार भेजने के बजाय बातचीत की ऐसी प्रक्रिया शुरू क्यों नहीं करते, जिससे वहां युद्ध खत्म होने की सूरत बने? उन देशों का नजरिया यह लगता है कि उनकी भू-राजनीतिक गणनाओं को पूरा करने की कीमत दूसरे देश उठाएं। क्या भारत की जनता की खाद्य सुरक्षा की सबसे पहले चिंता करना भारत सरकार का फर्ज नहीं है? जहां तक इस निर्णय से किसानों को नुकसान होने का मुद्दा है, उस पर अलग से चर्चा हो सकती है। लेकिन वह देश के अंदर का मुद्दा है।

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